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An Indian Morning

An Indian Morning
Sunday April 14th, 2019 with Dr. Harsha V. Dehejia and Kishore "Kish" Sampat
An Indian Morning celebrates not only the music of India but equally its various arts and artisans, poets and potters, kings and patriots. The first 30 minutes of the program features classical, religious as well as regional and popular music. The second

An Indian Morning celebrates not only the music of India but equally its various arts and artisans, poets and potters, kings and patriots. The first 30 minutes of the program features classical, religious as well as regional and popular music. The second one hour features community announcements and ear pleasing music from old/new & popular Indian films. The ethos of the program is summarized by its signature closing line, "Seeking the spirit of India, Jai Hind". 01-SRI RAMCHANRA KRIPALU CD MISC-20190414 TRACK#01 5:23 VANDE GURU PARAMPARAAM-2016; SOORYAGAYATHRI; KULDEEP M PAI https://www.youtube.com/watch?v=MyNSOu-Fl-k एक बार फिर हार्दिक अभिनंदन आप सबका, शुक्रिया, घन्यवाद और Thank You इस प्रोग्राम को सुनने के लिए । भारत त्योहारों का देश है, यहां कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते है और सभी धर्मों के अपने-अपने त्योहार है। बैसाखी पंजाब और आसपास के प्रदेशों का सबसे बड़ा त्योहार है। बैसाखी पर्व को सिख समुदाय नए साल के रूप में मनाते हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर साल 13 अप्रैल को बैसाखी पर्व मनाया जाता है जिसे देश के भिन्न-भिन्न भागों में रहने वाले सभी धर्मपंथ के लोग अलग-अलग तरीके से मनाते हैं। वैसे कभी-कभी 12-13 वर्ष में यह त्योहार 14 तारीख को भी आ जाता है। इस वर्ष बैसाखी का पर्व रविवार, 14 अप्रैल 2019 को मनाया जा रहा है। बैसाखी नाम वैशाख से बना है। बैसाखी मुख्यत: कृषि पर्व है जिसे दूसरे नाम से 'खेती का पर्व' भी कहा जाता है। यह पर्व किसान फसल काटने के बाद नए साल की खुशियां के रूप में मानते हैं। यह पर्व रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक है। वर्ष 1699 में सिखों के 10 वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसका 'खालसा' खालिस शब्द से बना है जिसका अर्थ शुद्ध, पावन या पवित्र होता है। खालसा पंथ की स्थापना के पीछे गुरु गोविंद सिंह का मुख्य लक्ष्य लोगों को तत्कालीन मुगल शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके धार्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाना था। भारतभर में बैसाखी का पर्व सभी जगह मनाया जाता है। यह एक राष्ट्रीय त्योहार है। यह केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के अन्य प्रांतों में भी उल्लास के साथ मनाया जाता है। बैसाखी आकर पंजाब के युवा वर्ग को याद दिलाती है, साथ ही वह याद दिलाती है उस भाईचारे की जहां माता अपने 10 गुरुओं के ऋण को उतारने के लिए अपने पुत्र को गुरु के चरणों में समर्पित करके सिख बनाती थी। 02-O AAGAYI VAISAKHI MITRON CD MISC-20190414 TRACK#02 3:23 VAISAKHI-2018; MOHAN REHRWAN; EII CRUZ (LALIT) https://www.youtube.com/watch?v=0t7ws3VJhVs "प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है..." “An Indian Morning” के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। आज पेश है जगजीत सिंह की आवाज़ में एक ग़ज़ल, जिसमें वो प्यार में पहला ख़त लिखने की बातें बता रहे हैं। “कहकशाँ” में आज हम जिस फ़नकार को ले आए हैं, उन्हें अगर ग़ज़ल-गायकी का बेताज बादशाह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। कई ज़माने बीत गए, लेकिन इनकी गायकी की मिठास उनके दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कहने तक क़ायम रही। १९९६ में "फ़ेस टू फ़ेस" नाम की ग़ज़लों की एक ऐल्बम आई थी, जिसमें ९ गज़लें थी। आज हम जिस गज़ल की बात कर रहे हैं वह है "प्यार का पहला ख़त" जिसे लिखा है हस्ती ने और जिसे अपनी साज़ और आवाज़ से सजाया है पद्म भूषण "गज़लजीत" जगजीत सिंह जी ने। ग़ज़लें पहले बुद्धिजीवी वर्ग को ही समझ आती थी, लेकिन जगजीत सिंह ने यह ढर्रा ही बदल दिया। और उस पर आश्चर्य यह कि जगजीत सिंह भारतीय वाद्ययंत्रों के साथ पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं, तब भी उनकी गज़लों में वही पुराना हिन्दुस्तानी अंदाज दिखता है। सदियों पहले कबीर ने कहा था: कारज धीरे होत है काहे होत अधीर, समय पाये तरूवर फले केतक सींचो नीर। और कुछ ऐसे विचार थे रहीम के: रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए, टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए। आइये हम सब प्यार के इन्हीं इशारों को समझते हुए पहले ख़त के अनुभव को महसूस करते हैं और हस्ती के बोल और जगजीत सिंह के धुनों में खो जाते हैं: 03-PYAR KA PEHLA KHAT LIKNE MEIN WAQT TO LAGTA HAI CD MISC-20190414 TRACK#03 4:21 FACE TO FACE-1996; JAGJIT SINGH; HASTI https://www.youtube.com/watch?v=1e2eFsGhQNg ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना....राजेंद्र कुमार की दरख्वास्त रफी साहब की आवाज़ में रफ़ी साहब और राजेन्द्र कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो जो जो प्रमुख फ़िल्में ज़हन में आती हैं, उनके नाम हैं धूल का फूल, मेरे महबूब, आरज़ू, सूरज, गंवार, दिल एक मंदिर, और आयी मिलन की बेला। लेकिन एक और फ़िल्म ऐसी है जिसमें मुख्य नायक राज कपूर थे, और सह नायक रहे राजेन्द्र कुमार। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के ज़्यादातर गानें मुकेश ने ही गाये होंगे, लेकिन उस फ़िल्म में दो गानें ऐसे थे जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माये जाने थे। उनमें से एक गीत तो लता-मुकेश-महेन्द्र कपूर का गाया हुआ था जिसमें राजेन्द्र साहब का प्लेबैक किया महेन्द्र कपूर ने, और दूसरा जो गीत था वह रफ़ी साहब की एकल आवाज़ में था। जी हाँ, यहाँ फ़िल्म 'संगम' की ही बात चल रही है। रफ़ी साहब के गाये इस अकेले गीत ने वो शोहरत हासिल की कि जो शायद फ़िल्म के दूसरे सभी गीतों को बराबर का टक्कर दे दे। इसमें कोई शक़ नहीं कि रफ़ी साहब के गाये इस गीत ने फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार के किरदार को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाया और किरदार को और ज़्यादा सशक्त किया। "ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो"। गीत का मुखड़ा और अंतरे जितने ख़ूबसूरत हैं, उतना ही ख़ूबसूरत है गीत के शुरुवाती बोल - "मेहरबाँ लिखूँ, हसीना लिखूँ, या दिलरुबा लिखूँ, हैरान हूँ कि आप को इस ख़त में क्या लिखूँ"! हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा! और रफ़ी साहब तो रफ़ी साहब, क्या समर्पण और अदायगी इस गीत में उन्होने दिखाई है, के सुन कर प्रेम-पत्र लिखने वाले के लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो जाये! शंकर जयकिशन का संगीत भी उतना ही असरदार था इस गीत में। कुल मिलाकर यह गीत इन सभी कलाकारों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन कर रह गया। और आज हम उसी पड़ाव से गुज़र रहे हैं, तो सुनिये फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर का यह सुनहरा नग़मा। और हाँ, आप को यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के लिये राजेन्द्र कुमार को उस साल के फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार मिला था। (music for 2:30) 04-YE MERA PREM PATRA PADHKAR CD MISC-20190414 TRACK#04 7:37 SANGAM-1963; MOHAMMAD RAFI; SHANKAR-JAIKISHAN; HASRAT JAIPURI https://www.youtube.com/watch?v=PuaFmVz3dr8 "तू कहाँ ये बता इस नशीली रात में, माने ना मेरा दिल दीवाना" देव आनंद निर्मित एवं विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'तेरे घर के सामने' बनी थी सन् १९६३ में। नूतन इस फ़िल्म की नायिका थीं। राहुल देव बर्मन ने अपने पिता को ऐसिस्ट किया था इस फ़िल्म के गीत संगीत में। प्रस्तुत गीत आज भी पूरे चाव से सुने जाते हैं। मजरूह सुल्तानपुरी ने ये सारे गानें लिखे थे। "तू कहाँ ये बता" एक बड़ा ही रुमानीयत और नशे से भरा गाना है जिसे रफ़ी साहब ने जिस नशीले अंदाज़ मे गाया है कि इसका मज़ा कई गुना ज़्यादा बढ़ गया है। इस गीत की एक और खासियत है इस गीत में इस्तेमाल हुए तबले का। दोस्तों, यह तो मैं पता नहीं कर पाया कि इस गीत में तबला किसने बजाया था, लेकिन जिन्होने भी बजाया है, क्या ख़ूब बजाया है, वाह! गीत के बोल सीधे सरल शब्दों में होते हुए भी दिल को छू जाते हैं। तो दोस्तों, सदाबहार नायक देव आनंद और सदाबहार गायक मोहम्मद रफ़ी साहब के नाम हो रही है आज की यह नशीली रचना , सुनिए। 05-TU KAHAN YE BATAA CD MISC-20190414 TRACK#05 4:44 TERE GHART KE SAAMNE-1963; MOHAMMAD RAFI; S. D. BURMAN; MAJROOH SULTANPURI https://www.youtube.com/watch?v=E_nS1FAI8_0 ओ मेरी ओ मेरी शर्मीली-शर्मीली १९७१ सुनते हैं फिल्म शर्मीली का शीर्षक गीत। गीत के शुरू में ऐसा लगता है मानो गाने वाले के ऊपर एक बाल्टी ठंडा पानी डाल दिया गया हो और उसे तुरंत गाने को कहा गया हो। गायन में जितने प्रयोग किशोर कुमार और मन्ना डे के ऊपर किये गए शायद ही और गायकों को ये अवसर मिले हों। गीत अपने में काफी लोकप्रिय रहा है और आज भी कभी कभार सुनाई दे जाता है। नीरज का लिखा गीत किशोर कुमार ने गाया है एस डी बर्मन के संगीत निर्देशन में। गीत में गीतकार का नाम भी एक बार आता है चाहे आँखों की तारीफ़ के बहाने ही हो। 06-O MERE O MERI SHARMEELEE CD MISC-20190414 TRACK#06 3:58 SHARMEELEE-1971; KISHORE KUMAR; S. D. BURMAN; NEERAJ https://www.youtube.com/watch?v=BLptcBu0a44 खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को मिलते हैं दिल यहाँ, मिल के बिछड़ने को खिलते हैं गुल यहाँ... EXTREMELY Melodious song from Kishore Kumar. Such is the depth and soulful rendering by Kishore Da, Lata version had simply been eclipsed. Kishore Kumar’s voice is unique and heart touching and pronunciation has been key point. Kishore Da’s diction and command over Hindi language is evident. Kishore Kumar added spice by his loud shouts, ARREY, Feelings, emotions and mastered the romantic songs. He has had the uncanny knack of improvising and extra contribution which proved him to be complete artist. So Babloo Lahoriya here is the hummable song aap ke anurodh pe…. 07-KHILTE HAIN GUL YAHAN CD MISC-20190414 TRACK#07 4:10 SHARMEELEE-1971; KISHORE KUMAR; S. D. BURMAN; NEERAJ https://www.youtube.com/watch?v=ZTqz4JIN7UM ताजा सुरताल Composer Pritam is quite excited about the new song from Kalank! Love and grandeur come alive with ‘Ghar More Pardesiya’ from the movie Kalank starring Alia Bhatt, Varun Dhawan, Madhuri Dixit, Sanjay Dutt, Sonakshi Sinha and Aditya Roy Kapur. The incredible and gorgeous song not only has incredible music by Pritam it also features lyrics by Amitabh Bhattacharya, is sung by Shreya Ghoshal with Vaishali Mhade and features amazing choreography by Remo D’souza. Speaking specifically about the song Pritam says, “This is my first song picturised on kathak visuals and this is a Raag based song. The dance is the backdrop of Ramayan where this is a love song of Sita.” Let’s get lost in the grandeur of the visuals, the beauty of the dance and the incredible music. 08-GHAR MORE PARDESIYA MISC-20190414 TRACK#08 5:18 KALANK-2019; SHREYA GHOSHAL, VAISHALI MHADE; PRITAM; AMITABH BHATTACHARYA https://www.youtube.com/watch?v=tb_rQJpSFVY THE END समाप्त
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